रांची :- लाखों कोयला कर्मचारियों, अधिकारियों और पेंशनभोगियों के भविष्य निधि एवं पेंशन का प्रबंधन करने वाले कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (सीएमपीएफओ) में नियमित आयुक्त का अभाव अब एक स्थायी प्रवृत्ति का रूप लेता जा रहा है। पिछले करीब डेढ़ दशक के कार्यकाल पर नजर डालें तो संगठन लगभग एक दशक तक प्रभारी आयुक्तों के भरोसे संचालित हुआ है, जबकि इस अवधि में नियमित आयुक्तों का कार्यकाल कुल मिलाकर लगभग पांच वर्ष ही रहा है।
ताजा घटनाक्रम में केंद्र सरकार की नियुक्ति समिति (एसीसी) ने कोल कंट्रोलर सजीश कुमार एन. को सीएमपीएफओ आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार 31 अक्टूबर 2026 तक अथवा अगले आदेश तक जारी रखने की मंजूरी दी है। सजीश कुमार 1 मई 2025 से यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके कार्यकाल के विस्तार के साथ ही सीएमपीएफओ में नियमित नेतृत्व की कमी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
डेढ़ दशक में प्रभारी आयुक्तों का लंबा दौर
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 के बाद से सीएमपीएफओ में नेतृत्व की स्थिति कुछ इस प्रकार रही है—
*2012 से फरवरी 2015 तक कोल कंट्रोलर अमृत आचार्य प्रभारी आयुक्त रहे।
*फरवरी 2015 से 16 मई 2016 तक कोयला मंत्रालय के तत्कालीन आर्थिक सलाहकार अनिमेष भारती ने प्रभारी आयुक्त के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
*मई 2016 से जून 2017 तक बी.के. पंडा नियमित आयुक्त रहे।
*जून 2017 से फरवरी 2022 तक पुनः अनिमेष भारती प्रभारी आयुक्त रहे।
*फरवरी 2022 से अप्रैल 2022 तक बीसीसीएल के तत्कालीन सीएमडी समीरन दत्ता को अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
*अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 तक वी.के. मिश्रा नियमित आयुक्त रहे।
*1 मई 2025 से वर्तमान तक सजीश कुमार एन. प्रभारी आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले डेढ़ दशक में सीएमपीएफओ ने नियमित आयुक्तों की तुलना में कहीं अधिक समय अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था के तहत बिताया है।
बीओटी सदस्य कहते हैं
“प्रभारी आयुक्त होने से प्रभावित होता है कामकाज” :- डीडी रामानन्दन
प्रभारी आयुक्त अतिरिक्त जिम्मेदारी के रूप में सीएमपीएफओ का काम देखते हैं, जबकि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी उनका मूल विभाग होता है। वर्तमान में सजीश कुमार एन. कोल कंट्रोलर भी हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से उनकी प्राथमिकता कोल कंट्रोलर ऑर्गेनाइजेशन (सीसीओ) का कार्य रहेगा।
उन्होंने कहा कि आयुक्त का पद संयुक्त सचिव स्तर का है और कई अधिकारी धनबाद में पदस्थापना के प्रति उत्सुक नहीं होते। इसी कारण बीओटी ने सीएमपीएफओ आयुक्त कार्यालय को रांची स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है, ताकि वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर किया जा सके।
“यह कोयला मंत्रालय की नाकामी” :- राकेश कुमार
नियमित आयुक्त की नियुक्ति में हो रही देरी को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसे कोयला मंत्रालय की विफलता करार दिया। उन्होंने कहा कि शीर्ष पद पर स्थायी नेतृत्व नहीं होने से निचले स्तर पर जवाबदेही प्रभावित होती है और कर्मचारियों व पेंशनभोगियों की रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान में भी विलंब होता है।उनके अनुसार, केंद्र सरकार और कोयला मंत्रालय को शीघ्र नियमित आयुक्त की नियुक्ति करनी चाहिए ताकि संगठन का कामकाज अधिक प्रभावी और व्यवस्थित तरीके से संचालित हो सके।





